नज़र-ए- तासीर बदल देना फ़क़त हमें क्या ख़ूब दिखाता है, उस पार दिखाने वाला शीशा कमबख़्त आइना भी दिखाता हैl ...✍️- इंशपा इलाहाबादी
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के मैं तेरे साथ हूँ मात दे परिंदो को, उड़ चल आसमानो से आगे l ----के मैं तेरे साथ हूं---- पँख लगा हौसलों को, कहो सोते हुए नसीबों से जागे l ----के मैं तेरे साथ हूं---- राय सब देंगे साथ कोई न देगा, जान कहेँगे पर जान कोई न देगा l चोट सहलाना छोड़ छोड़ दुनिया की बाते, पाल मत ज़ख्म को दे जलते तेल से दाग़ेl ----के मैं तेरे साथ हूं---- खाइशे चल रही है गुठनो के बल, कहो उठ कर दौड़े, ज़ोर से भागे l ----के मैं तेरे साथ हूं---- लकीरों पे यकीन करना छोड़ अब दायरे में ज़िन्दगी जीना छोड़ अब छोड़ ज़माने की रश्म-ए-रिवाज़ को सोच ऊँची कर निकल सोच सब से आगे ----के मैं तेरे साथ हूं---- पानी पे घर बना तू 'दिया' जलाये तूफां में ज़मीं बनेगी आसमां बस तेरे पाँव से लागे ----के मैं तेरे साथ हूं---- मात दे परिंदो को उड़ चल आसमानो से आगे...
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देख रहा था मैं उसे देख रहा था, जो मुझे नहीं देख रहा था वो किसी को देख रहा था । मेरा किसी और को देखना, किसी और का उसे देखना। वो जिसे देख रहा था , वो उसे ही देख रहा था। कोई और ये देख रहा था, के मैं उसे देख रहा था। जो मुझे नहीं देख रहा था, जो किसी और को देख रहा था। वो मुझे नहीं देख रहा था, पर मैं देख रहा था । के एक वो है जो, सब देख रहा था । इंशपा इलाहाबादी
बाकी है
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" बाकी है" अभी आंच से डर गए, अभी तो आग बाकी है। दर्द ही हर्फ बन गए, अभी तो अनुराग बाकी है। अभी तो लड़खड़ा के, हमने चलना सीखा है। अभी एक दौड़ बाकी है, अभी एक भाग बाकी है। अंधेरी रात होती है , सितारे टिमटिमाते हैं। अभी सोया हुए सूरज के, सुबह की जाग बाकी है। अभी आंच से डर गए, अभी तो आग बाकी है। ✍️ _ इंशपा इलाहाबादी
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"मज़ा आए" प्रमोद कुुमार इंशपा तुम जब देख के शरमाओ तो मज़ा आए, छूके मुझको खुद घबराओ तो मज़ा आए। तबीयत हरी हो जाए तेरी इक निग़ाह से, पास आके लिपट जाओ तो मज़ा आए। सरकता आंचल उफ्फ ये जोबन तुम्हारा, अपनी उंगलियां फिराऊं तो मज़ा आए। तुम हो कमरे में और रोशनी कोने कोने में, बत्तियां खुद ही बुझाओ तो मज़ा आए । नज़रें झुकाए हो और कुछ बोलते भी नहीं, होंठों से होंठो पे करो गुदगुदी तो मज़ा आए। डर जाता है दिल कभी करीब से गुजरें तो, आज तुम हद से गुजर जाओ तो मज़ा आए। ............✍️इंशपा इलाहाबादी